सुनील कोठारी द्वारीखाल में कर रहे हैं बिच्छू घास यानि हिमालयन नेटल टी का उत्पादन…

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सुनील कोठारी द्वारीखाल में कर रहे हैं बिच्छू घास यानि हिमालयन नेटल टी का उत्पादन…

जागो ब्यूरो रिपोर्ट:

उत्तराखण्ड में पाये जाने वाली जंगली घास जिसको स्थानीय भाषा में कंडाली या बिच्छू घास के नाम से जानते हैं,प्रायः इसका प्रयोग उत्तराखण्ड के लोग कंडली बिच्छू घास का उपयोग तरी वाली सब्जी बनाने में करते हैं, इसका उपयोग प्राय सर्द मौसम में किया जाता है,

इसका मुख्य कारण इसमें पाए जाने वाले वितामिन में सर्द मौसम से लड़ने में प्रचुर क्षमता है तथा बिच्छू घास ही एक ऐसा पौधा है जो मौसम की मार से बच सकता है तथा भारी हिमपात होने पर भी यह पौधा जीवित रहता है।सुनील दत्त कोठारी चेलुसैंण ब्लॉक द्वारीखाल जिला पौड़ी गढ़वाल उत्तराखण्ड में इनकी पत्तियों वह जड़ों पर कार्य कर रहे हैं,इस प्राकृतिक पौधे का मिश्रण बनाकर चाय के उत्पाद के रूप में अनुसन्धान और व्यावसायिक प्रयोग पर काम कर रहे हैं। सुनील कोठारी बताते हैं पत्तियों का चुनाव ही चाय की गुणवत्ता का आधार है तथा ड्राई प्रोसेस यूनिट के द्वारा वह इसमें गुणवत्ता का मानक प्रदान करते हैं,सामान्यता तापमान अगर गर्म है तो यह कार्य बीस से पच्चीस दिन में पूर्ण होता है,इसके लिए कोठारी उत्तराखण्ड में खाली पड़े घरों का प्रयोग करते हैं,वे पठाल यानी पत्थरों के ढालदार मकान अर्थात हमारे पुश्तैनी धरोहरों हैं, को भी विरासत के रूप में संजोने का काम भी करते हैं,ऐसे घरों की बनावट ,दीवारों की मोटाई, तापमान को नियत करने में बहुत ही सहायक सिद्ध होते हैं,इस कार्य को पूर्ण रूप से तीन अलग-अलग कमरों में प्रक्रिया की जाती है, सर्वप्रथम बिच्छू घास को गर्म पानी से धोया जाता है,वह सूर्य के तेज प्रकाश में सूखने के लिए रखा जाता है,अगले दिन इन पत्तियों की गहन जाँच करके पाँच प्रकार से वर्गीकृत करके अलग-अलग गुच्छे के रूप में , हवा में झूलते हुए लटकाया जाता है,बिच्छू घास के गुच्छे को लटका ते वक्त इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता है कि यह धरातल और दीवार से स्पर्श ना हो, यह एक प्रारम्भिक रूप है,इसको हम ड्राई रूम प्रोसेस कहते हैं,इस प्रक्रिया को बार-बार समय-समय पर जांच की जाती है और देखा जाता है कि पत्तियों का रंग काला तो नहीं पड़ रहा है, साथ ही साथ जैविक उपचार चलता रहता है, अगर मौसम में नमी की मात्रा ज्यादा हो तो कृत्रिम विधि हीटर द्वारा कमरे का तापमान नियत किया जाता है व सुबह शाम नीम की पत्तियों का धुआं देकर कक्ष को कीटाणु रहित किया जाता है, पानी का छिड़काव करके कक्ष को नमी प्रदान की जाती है,ताकि पत्तियों का रंग स्थिर बना रहे, साथ ही साथ चाय का स्वाद और गुणवत्ता भी लाजवाब हो,इस तरह ड्राई रूम में चौदह दिन की मेहनत के बाद,इसको दूसरे कक्ष में गुच्छ को रखा जाता है,पाँच प्रकार की पत्तियों की गुणवत्ता की जांच करके,पत्तियों का फैलाव प्राकृतिक रंग का चुनाव को देखते हुए अगले दो दिन गुणवत्ता की दृष्टि में रखा जाता है तथा कमरे में अंधेरा बनाये रखा जाता है, यह प्रक्रिया पाँच से छः दिन लेती है,तब जाकर चाय कड़क बन पाती है,आखिर के कुछ दिनों में गुणवत्ता के आधार पर अलग अलग किया जाता है

पैकिंग की प्रक्रिया में इनको बारीक पीसा जाता है,इसके उपरांत जार या बोतल में इनको पैक किया जाता है,पूर्व अनुसंधान के अनुसार इस चाय से शरीर में क्षमता की वृद्धि होती है,जो हमारे रोग प्रतिरोधी क्षमता को बनाए रखती है,ऊर्जा का संचार नए रक्त का निर्माण मैं यह चाय महत्वपूर्ण है, किसी भी दर्द में इसका सेवन फायदेमंद रहा है,अगर इसका स्वाद आपको पसंद आया बाद में आप दूध के साथ भी इसका सेवन कर सकते हैं,सुनील दत्त कोठारी की यह मुहिम रोजगार परक है,उनका एक ही सपना है उत्तराखण्ड पलायन मुक्त रोजगार युक्त हो,यह कार्य वह पुरुष और महिला समूह के द्वारा करवाते हैं जो कि एक रोजगार परक कार्यक्रम है,आने वाले समय में वह इस पर गहन कार्यक्रम बड़े स्तर पर करने जा रहे हैं।

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