कोरोना के पॉजिटिव साइड इफ़ेक्टस!चालीस साल पुराने बंजर और खण्डहर हो रहे आबाद..

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कोरोना के पॉजिटिव साइड इफ़ेक्टस!चालीस साल पुराने बंजर और खण्डहर हो रहे आबाद..

जागो ब्यूरो रिपोर्ट:

कोरोना संकट की वजह से उत्तराखण्ड के वर्षों से बंजर पड़े खेत और खण्डहर पड़े मकानों के आबाद होने की उम्मीद जग गयी है,इसे कोरोना का पॉजिटिव साइड इफेक्ट ही कहा जायेगा,जब सरकार समेत बहुत सारे बुद्धिजीवियों का पलायन पर “चिंतन” और पलायन रोकने पर शोध करने के नाम बना “पलायन आयोग”भी उत्तराखण्ड से बेहिसाब पलायन न रोक सका और न ही प्रवासियों को घर वापसी के लिये कोई ठोस योजना बना प्रेरित कर सका,ऐसे में कोरोना संकट की वजह से लाखों प्रवासी घर वापसी की राह में हैं,कोरोना की मार से अब उत्तराखण्ड के गाँवों के खंडहर पड़े मकान और बंजर आबाद होने लगे हैं,पौड़ी के पास डोभा गाँव में मुकेश डोभाल अपने परिवार की चालीस साल पुरानी बंजर जमीन को आबाद कर रहे हैं,उन्होंने फिलहाल यहां पर प्याज़ के अलावा करेला ,तुरई, कद्दू,लौकी जैसी बेल पर उगने वाली सब्जी को मूली ,बैंगन,फ्रासबीन जैसी सब्जियों के साथ कम जगह में ज्यादा उत्पादन की तकनीक कर उगाने की शुरुवात कर दी है,पौड़ी की जिला उद्यान अधिकारी डॉ. नरेन्द्र कुमार जो इस तरह के काश्तकारों को प्रोत्साहित करने के लिए काफी प्रोएक्टिव दिखाई दे रहे हैं भी डोभाल को प्रोत्साहित करने उनके गाँव डोभा पहुंचे और उन्हें हर संभव विभागीय सहायता का आश्वासन दिया,मुकेश डोभाल जैसे अनगिनत छोटे बड़े का काश्तकार घर वापसी कर रहे प्रवासी उत्तराखंडी भाइयों समेत स्थानीय बेरोजगारों के लिए रोल मॉडल है,कि कैसे कम संसाधन में ही अपने बंजरों को आबाद किया जा सकता है, इन खेतों के आबाद होने से कुछ समय बाद मुकेश के गांव का चालीस साल से पुराना खंडहर मकान भी आबाद हो जायेगा,बताइये कोरोना का इससे बढ़िया सकारात्मक परिणाम और क्या हो सकता है!

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