साल माँ द्वी दिन गैरसैण,एक दिन पौड़ी,बाकी देरादून हे नेताओं तुमन करयाली हमारा अरमानों कु खून..

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साल माँ द्वी दिन गैरसैण,एक दिन पौड़ी,बाकी देरादूनहे

नेताओं तुमन करयाली हमारा अरमानों कु खून..

गैरसैंण-भराड़ीसैण से आशुतोष नेगी की एक्सक्लुसिव रिपोर्ट

उत्तराखण्ड में पिछले अठारह सालों में राज्य में आयी सरकारें उत्तराखण्ड के सभी जनपदों जिसमें ख़ासकर गढ़वाल और कुमाऊँ के पहाड़ी जनपद पौड़ी, रुद्रप्रयाग,चमोली,टिहरी,उत्तरकाशी और कुमाऊँ मण्डल के नैनीताल,पिथौरागढ़,चम्पावत,बागेश्वर,अल्मोड़ा शामिल हैं,पर लगने वाले फण्ड को देहरादून में स्वयं के लिये सुविधायें जुटाने में लगा रही हैं,उत्तराखण्ड राज्य के लिये आन्दोलन करने और बलिदान देने वाले क्रान्तिकारियों समेत आम जनभावना गैरसैंण को राजधानी बनाने के पक्ष में थी, क्योंकि जिस पहाड़ी राज्य की परिकल्पना की गयी थी,उसका विकास पहाड़ में बैठकर किया जाना था,नहीं तो लखनऊ क्या बुरा था?लेकिन राजनेताओं ने केवल व्यक्तिगत स्वार्थ सिद्धि के लिये राजधानी देहरादून बना दी, जँहा से विकास का दम पहाड़ की चढ़ाई लगते ही फूलने लगता है,गैरसैंण को राजधानी बनाने के लिये पहाड़ के लोगों के बढ़ते दबाव के चलते गैरसैंण के नज़दीक भराड़ीसैण में करोड़ो रूपये की लागत से विधानसभा भवन बनवा दिया गया,जिसके आस पास अभी भी निर्माण कार्य जारी है और अगले कुछ सालों में ही अरबों रुपये इस निर्माण कार्य पर लग चुके होंगे,बड़ा सवाल ये कि तेरह जनपदों वाले छोटे से प्रदेश उत्तराखण्ड को क्या दो राजधानियों की आवश्यकता है?बेशक नहीं,तो फिर केवल कुछ दिन के विधानसभा सत्र के लिये भराड़ीसैण में करोडो रुपये क्यों कर लगाये जा रहे हैं?अगर आप पहाड़ी इलाकों के विकास के लिये ईमानदार हैं,तो राजधानी देहरादून से गैरसैंण शिफ्ट क्यों नहीं करते,पिछले कुछ सालों में भराड़ीसैण में हुयी कैबिनेट में गैरसैंण के लिये कुछ किया गया हो ऐसा नहीं लगता,क्योंकि राजनेताओं ने ख़ुद की सुविधाओं के लिए भराड़ीसैण का तो विकास किया,लेकिन जिसके नाम राजधानी बनायी जा रही है उस कस्बे गैरसैंण की हालत जस की तस है ,संकरी सड़कें, सड़क में खड्ड,टूटी नालियां,टॉयलेट्स और जन सुविधाओं का अभाव,इसका मतलब उत्तराखण्ड के जनप्रतिनिधि इस क्षेत्र के विकास पर कोई अहम चर्चा करने के बजाय केवल पिकनिक मना के चल दिये,अगर हमारी सरकारें और उसके प्रतिनिधि ईमानदार होते तो गैरसैंण में राजधानी बनाने से पहले पर्यटन,औद्यानिकी, कृषि,पशुपालन जैसे कुछ एक मंत्रालय तो यंहा से संचालित करते, जिससे यंहा हुये निर्माण का कुछ तो लाभ पहाड़ के लोगों को मिलता,यंहा तक कि उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय ने भी सरोवर नगरी नैनीताल पर बढ़ते दबाव को देखते हुये जनता से सुझाव माँगे हैं कि उसे कँहा शिफ्ट किया जाये? सरकार ने अभी तक इस पर अपना रुख़ साफ़ नहीं किया है,गैरसैंण इसके लिये उचित स्थान हो सकता था,क्योंकि यह गढ़वाल और कुमाऊँ के मध्य है,लेकिन उत्तराखण्ड सरकार ने ऐसा कुछ नहीं किया,क्योंकि उन्हें तो गैरसैंण के नाम पर सिर्फ़ और सिर्फ़ राजनीति करनी है,आजकल देहरादून में विधानसभा सत्र चल रहा है ,लेकिन करोड़ो रुपये की लागत से बने भराड़ीसैण के विधानसभा भवन की चौकीदारी के लिए सिक्युरिटी गार्ड तक तैनात नहीं, यदि कोई आतंकवादी या राष्ट्रविरोधी तत्व यँहा पहुँच जाये तो मिनटों में सब कुछ समाप्त कर निकल जाये,लेकिन किसी को चिंता नहीं क्योंकि ये तो जनता का पैसा है बर्बाद भी हो जाये तो क्या?29 जून को पौड़ी में भी कैबिनेट बैठक आयोजित करने को आजकल शहर को साफ़ सुथरा दिखाने और सड़कों को बढ़िया दिखाने समेत,बैठक हेतु लाखों रुपये का तम्बू लगाया जा रहा है,एक बार फिर जनता पर लगने वाले करोड़ों रुपयों की होली खेली जायेगी,उसके बाद हालात फ़िर जस के तस,क्यों नहीं हम उत्तराखण्डी उत्तराखण्ड सरकार और अपने जनप्रतिनिधियों पर दवाब बनायें, कि गैरसैंण में पूर्णकालिक राजधानी और पहाड़ी जनपदों में कोई न कोई निदेशालय शिफ्ट कर विकास का विकेंद्रीकरण किया जाये, जागिये ये हमारा पैसा है ,इन सफेदपोशों का नहीं,इससे पहले कि सब लुट जाये..

जागो!

 

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